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बच्‍चें की इन हरकतों को न करें नजरअंदाज, ADHD जैसी गंभीर बीमारी के हो सकते है संकेत
Boldsky | 31st Aug, 2019 12:10 PM
  • लक्षण

    अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर से पीड़ित बच्चों में यह लक्षण दिखाई देते हैं:

    - लगातर भागते रहना या एक जगह न बैठना
    - बैठने पर भी अपनी जगह पर हिलते रहना या कुछ करते रहना
    - किसी बात पर ध्यान न देना
    - शांत न रहना
    - बहुत ज्यादा बात करना
    - दूसरों के काम में दखल देना
    - आसानी से डिस्ट्रेक्ट हो जाना
    - काम खत्म न करना
    - काम के बीच में ही दूसरा काम करने लगना
    - चिल्लाना, चीजें फेंकना
    - कई मामलों में बच्चे लगातार चुप बैठे रहते हैं और अपने काम में खोए रहते हैं उनका ध्यान आकर्षित करने में दिक्कत होती है


  • कैसे फर्क मालूम करें

    अंटेशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर में इम्पल्सिव और हाइपरएक्टिविटी दोनों के लक्षण एक साथ दिखाई देने लगते हैं। इसमें व्यक्ति बहुत ज्यादा बोलने लगता है, हमेशा थका-थका सा महसूस करता है, किसी भी काम को पूरा नहीं कर पाना।

    डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऑर्डर और नॉर्मल किड बिहेवियर में अंतर करना मुश्किल हो सकता है। अगर आपको इसके सिर्फ कुछ लक्षण किसी खास परिस्थिति में दिखाई देते हैं तो हो सकता है यह एडीएचडी नहीं है। वहीं अगर लक्षण घर, स्कूल, बाहर कहीं जाने पर यानी सभी जगह दिखाता है तो आपको उसके व्यवहार पर थोड़ा और ध्यान देने की जरूरत है।


  • लक्षण दिखाई देने पर क्या करें

    लक्षण दिखाई देने पर डॉक्टर से संपर्क करें। डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर के बारे में पता लगाने के लिए कोई एक टेस्ट नहीं होता है। ज्यादातर टेस्ट बच्चे के व्यवहार पर बेस्ड होते हैं। । बच्चों का ट्रीटमेंट शुरू होने पर दवाइयां तो दी ही जाती है लेकिन ज्यादा जोर बिहैव्यरल ट्रीटमेंट पर होता है। यह कैसा होगा इस बारे में डॉक्टर डिसाइड करता है।




आमतौर पर बच्चे शरारत करते हैं और एक जगह न बैठकर कुछ न कुछ करते रहते हैं। यह उनकी नन्‍हीं उम्र में आम सा लगता है लेकिन हो सकता है कि ये अटेंशन-डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD) की ओर इशारा हो। एडीएचडी डिसऑर्डर एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है जिसके लक्षण छोटी उम्र में और आमतौर पर 7 वर्ष की उम्र से पहले दिखाई देना शुरू हो जाते हैं।

सही समय पर डायग्नोज नहीं होने पर उम्र के साथ यह समस्या बढ़ती जाती है और गंभीर रूप भी ले सकती है। भारत में इस विकार से पीड़ित बच्चों, किशोरों और वयस्कों की संख्या प्रति वर्ष 10 मिलियन के करीब देखने को मिलती हैं। इस विकार में बच्चे का अपने भावों पर नियंत्रण नहीं रह पाता है जिसके कारण वह परिस्थिति के अनुसार अपने भावों को व्यक्त नहीं कर पाता है।

   
 
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