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आज आएगा 'सुप्रीम' फैसला, जानें 5 सदी पुराने अयोध्या मामले का पूरा इतिहास
Khabar India TV | 9th Nov, 2019 08:03 AM

नई दिल्ली: देश के सबसे संवेदशनशील और चर्चित मामलों में से एक अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट आज अपना फैसला सुनाने वाला है। बीती 5 सदियों में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले ने देश की राजनीति के साथ-साथ यहां के समाज की दशा और दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई है। फैसले का दिन करीब आने के साथ ही तमाम तरह की शंकाएं और आशंकाएं जन्म लेने लगी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर मुस्लिम मौलाना तक लोगों से संयम बरतने की अपील कर रहे हैं। देश के तमाम राज्यों में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। 

बीते 500 सालों में देश ने अयोध्या को लेकर तमाम तरह के घटनाक्रम देखे हैं। आइए, एक नजर डालते हैं अयोध्या मामले के पूरे घटनाक्रम पर:

वर्ष 1528-29: कहा जाता है कि इसी समय राम मंदिर को गिराकर बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ। यह भी कहा जाता है कि इसे मुगल राजा बाबर के सेनापति मीर बकी बनवाया था, जिसके चलते इसे बाबरी मस्जिद कहा जाने लगा।

वर्ष 1853: बताते हैं कि अयोध्या में इस मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच 1853 में पहली बार हिंसा हुई थी। मुस्लिम हिंसा की पहली घटना 1853 में हुई थी। निर्मोही अखाड़े ने कहा था कि जहां मस्जिद खड़ी है वहां कभी मंदिर हुआ करता था। फैजाबाद जिला गजट 1905 के मुताबिक, इस मुद्दे पर अगले 2 सालों तक अवध में हिंसा भड़कती रही।

वर्ष 1859: 1857 में आजादी के पहले आंदोलन के चलते माहौल थोड़ा ठंडा पड़ गया था। इसके बाद 1859 में अंग्रेजों ने विवादित स्थल पर बाड़ लगा दी। साथ ही परिसर के भीतरी हिस्से में मुसलमानों और बाहरी हिस्से में हिंदुओं को प्रार्थना करने की इजाजत दे दी।

वर्ष 1885: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद पहली बार 1885 में फैजाबाद की अदालत में पहुंच गया। हिंदू साधु महंत रघुबर दास ने अदालत से बाबरी मस्जिद परिसर में राम मंदिर बनाने की इजाजत मांगी, लेकिन यह अपील ठुकरा दी गई।

वर्ष 1934: विवादित स्थल पर पहली बार दंगे भड़कने के लगभग 5 दशक बाद एक बार फिर हिंदू और मुसलमान एक-दूसरे के आमने-सामने हो गए। इस बार के दंगों में मस्जिद की दीवारों और गुंबदों को नुकसान पहुंचा था जिसके बाद ब्रिटिश सरकार ने इसकी मरम्मत कराई।

वर्ष 1949: यही वह साल था जब विवादित स्थल पर भगवान राम की मूर्तियां मिलीं। कहा गया कि मस्जिद में ये मूर्तियां हिन्दुओं ने रखवाई थीं। मुसलमानों ने इस पर विरोध व्यक्त किया और मस्जिद में नमाज पढ़ना बंद कर दिया विवाद बढ़ने पर हिंदू और मुस्लिम पक्ष अदालत पहुंच गए। सरकार ने भी इस स्थल को विवादित घोषित कर यहां ताला लगवा दिया।

वर्ष 1950: गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में फैजाबाद की अदालत में अपील दायर कर भगवान राम की पूजा कि इजाजत मांगी। इसके अलावा महंत रामचंद्र दास ने मस्जिद में हिंदुओं द्वारा पूजा जारी रखने के लिए याचिका लगाई।

वर्ष 1959-61: इस दौरान दोनों ही पक्षों ने विवादित स्थल पर मालिकाना हक पाने के लिए मुकदमे किए। पहले 1959 में निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल के हस्तांतरण के लिए मुकदमा किया। इसके बाद मुसलमानों की तरफ से उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने भी बाबरी मस्जिद पर मालिकाना हक के लिए मुकदमा कर दिया।

वर्ष 1984: विश्व हिंदू परिषद के नेतृत्व में हिंदुओं ने भगवान राम के जन्मस्थान पर मंदिर बनाने के लिए एक समिति का गठन किया। वहीं, गोरखनाथ धाम के महंथ अवैद्यनाथ ने भी राम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति बनाई।

वर्ष 1986: हिंदुओं की अपील पर फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट ने पूजा करने के लिए विवादित स्थल का दरवाजा खोलने का आदेश दे दिया। मुसलमानों ने इस आदेश का विरोध किया और बाबरी मस्जिद संघर्ष समिति/बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमिटी बनाई।

वर्ष 1989: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित स्थल के पास राम मंदिर की नींव रखी। वीएचपी नेता देवकीनंदन अग्रवाल ने रामलला की तरफ से मंदिर के दावे का मुकदमा किया। इसके बाद राम मंदिर निर्माण के लिए अभियान तेज हो गया।

वर्ष 1990: राम मंदिर निर्माण के लिए आंदोलन तेज होता गया। इस साल गुजरात, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में दंगे भड़क गए। बिहार में लालू यादव ने आडवाणी की रथ यात्रा रुकवाकर उन्हें गिरफ्तार करवा लिया। इस घटना के बाद बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। इसी साल मंदिर के लिए पहली कारसेवा हुई और तत्कालीन मुख्यमंत्री के आदेश पर हुई पुलिस की गोलीबारी में 5 कारसेवकों की मौत हो गई।

06 दिसंबर 1992: हजारों कारसेवकों की भीड़ ने अयोध्या में सदियों से खड़े विवादित ढांचे को गिरा दिया। इस घटना के बाद देश भर में हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन दंगों में 2 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

वर्ष 1992: विवादित ढांचे को ढहाने के मामले को लेकर जज एमएस लिब्रहान के नेतृत्व में लिब्रहान आयोग बनाया गया और मामले की जांच शुरू की गई।

वर्ष 1994: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में बाबरी मस्जिद विध्वंस से संबंधित मामला चलना शुरू हुआ।

वर्ष 1997: विशेष अदालत ने विवादित ढांचे को ढहाए जाने के मामले में 49 लोगों को दोषी करार दिया। इनमें भारतीय जनता पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं के नाम भी शामिल थे।

वर्ष 2001: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर बनाने की तारीख तय की। वीएचपी ने कहा कि मार्च 2002 को अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कराया जाएगा।

जनवरी 2002: तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इस विवाद को सुलझाने के लिए अयोध्या समिति बनाई। वरिष्ठ अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को वार्ता के लिए नियुक्त किया गया।

फरवरी 2002: भारतीय जनता पार्टी भाजपा ने यूपी चुनाव के लिए घोषणा पत्र से राम मंदिर निर्माण का मुद्दा हटा दिया। हालांकि, विहिप ने 15 मार्च से राम मंदिर बनाने की घोषणा कर दी। इसके बाद हजारों हिंदू अयोध्या में एकत्र हो गए। फरवरी में ही गोधरा कांड हो गया जिसमें अयोध्या से लौट रहे 58 कारसेवक मारे गए।

13 मार्च 2002: सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी को भी विवादित भूमि पर शिलापूजन की अनुमति नहीं होगी। केंद्र सरकार ने कहा कि अदालत के फैसले का पालन किया जाएगा।

15 मार्च 2002: विश्व हिंदू परिषद और केंद्र सरकार के बीच इस बात पर समझौता हुआ कि विहिप के नेता सरकार को मंदिर परिसर से बाहर शिलाएं सौंप देंगे। रामजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत परमहंस रामचंद्र दास और वीएचपी के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक सिंघल के नेतृत्व में लगभग 800 कार्यकर्ताओं ने सरकारी अधिकारी को शिलाएं सौंप दी।

अप्रैल 2002: हाईकोर्ट के तीन जजों की पीठ ने अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर सुनवाई शुरू की।

22 जून 2002: विश्व हिंदू परिषद ने विवादित भूमि पर मंदिर निर्माण की मांग उठाई।

जनवरी 2003: रेडियो तरंगों के जरिए विवादित स्थल के नीचे किसी प्राचीन इमाररत के अवशेष का पता लगाने कोशिश की गई, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल पाया।

मार्च 2003: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से विवादित स्थल पर पूजापाठ की अनुमति देने का अनुरोध किया, जिसे ठुकरा दिया गया।

अप्रैल 2003: हाईकोर्ट के आदेश पर पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने विवादित स्थल की जांच के लिए खुदाई शुरू की। पुरातत्‍व सर्वेक्षण विभाग ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि विवादित स्थल की खुदाई में मंदिर से मिलते-जुलते कई अवशेष मिले हैं। इस रिपोर्ट ने हिंदू पक्ष के दावे पर मुहर लगा दी थी।

मई 2003: CBI ने 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के मामले में उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत 8 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया।

जून 2003: कांची पीठ शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की पहल की, लेकिन उनकी कोशिशों का कोई नतीजा नहीं निकला।

अगस्त 2003: विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार से विशेष विधेयक लाने का अनुरोध किया। वीएचपी की इस मांग को तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने ठुकरा दिया।

अप्रैल 2004: लालकृष्ण आडवाणी ने अयोध्या के विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर में पूजा की। इस मौके पर आडवाणी ने कहा कि अयोध्या में मंदिर का निर्माण जरूर किया जाएगा।

जुलाई 2005: आतंकियों ने विवादित परिसर पर हमला किया, जिसमें 5 आतंकियों समेत 6 लोगों की जान गई।

4 अगस्त 2005: फैजाबाद की अदालत ने अयोध्या के विवादित परिसर के पास हुए आतंकी हमले में कथित रूप से शामिल 4 लोगों को न्यायिक हिरासत में भेजा।

20 अप्रैल 2006: कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने लिब्राहन आयोग को लिखित बयान दिया कि विवादित ढांचे को गिराना सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा था। इसमें कहा गया कि बीजेपी, आरएसएस, बजरंग दल और शिवसेना ने मिलकर इस साजिश को अंजाम दिया।

जुलाई 2006: सरकार ने विवादित स्थल पर बने अस्थाई राम मंदिर की सुरक्षा के लिए बुलेटप्रूफ शीशे का घेरा लगाने का प्रस्ताव तैयार किया। मुस्लिम पक्ष ने अदालत द्वारा दिए गए स्टे की अवहेलना की बात कहकर इस प्रस्ताव का विरोध किया।

30 जून 2009: अयोध्या के विवादित ढांचा विध्वंस मामले में जां; के लिए बनाए गए लिब्रहान आयोग ने 17 साल बाद अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सौंप दी।

07 जुलाई 2009: उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर बताया कि अयोध्या विवाद से जुड़ीं 23 महत्वपूर्ण फाइलें सचिवालय से गायब हो गई हैं।

24 नवंबर 2009: संसद के दोनों सदनों में लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश की गई। इसमें विवादित ढांचे को गिराए जाने के वक्त नरसिंह राव को क्लीन चिट दे दी गई।

20 मई 2010: विवादित ढांचा विध्वंस मामले में बीजेपी नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत अन्य नेताओं पर आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए दायर पुनरीक्षण याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी।

26 जुलाई 2010: अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी हो गई।

सितंबर 2010: हाईकोर्ट ने मामले में फैसला सुनाने के लिए 24 सितंबर की तारिख तय की। 28 सितंबर को हाईकोर्ट ने फैसला टालने की अर्जी खारिज कर दी। 30 सितंबर को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ में तीन जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांट दिया। इनमें से एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और तीसरा निर्मोही अखाड़े को मिला। फैसले से असंतुष्ट होकर दोनों पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

09 मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने के फैसले पर रोक लगा दी। इसके साथ ही मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में शुरू हुई। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ 14 अपीलें दाखिल हुईं।

मार्च 2017: 21 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही।

नवंबर 2017: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात के बाद शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिजवी ने कहा कि अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनना चाहिए, और मस्जिद का निर्माण वहां से दूर किया जाना चाहिए।

फरवरी-जुलाई 2018: सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से पक्ष रखते हुए वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट से मामले पर नियमित सुनवाई करने की अपील की, लेकिन अदालत ने उनकी अपील खारिज कर दी।

29 अक्टूबर 2018: सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जल्द सुनवाई से इनकार करते हुए केस जनवरी 2019 तक के लिए टाल दिया। अदालत ने कहा कि इस मामले की सुनवाई के लिए जनवरी के प्रथम सप्ताह में उचित पीठ का गठन होगा, जो इसकी सुनवाई का कार्यक्रम तय करेगा।

जनवरी 2019: अयोध्या केस की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों की संवैधानिक पीठ गठित हुई। पीठ में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस बोबडे और जस्टिस एनवी रमन्ना को शामिल किया गया।

10 जनवरी 2019: मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन द्वारा सवाल उठाए जाने पर जस्टिस यूयू ललित ने खुद को मामले की सुनवाई से अलग किया। राजीव धवन ने कहा था कि 1994 में इसी केस में जस्टिस यूयू ललित ने उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की अदालत में पैरवी की थी।

27 जनवरी 2019: जस्टिस बोबडे के छुट्टी पर होने की वजह से 29 जनवरी 2019 की प्रस्तावित सुनवाई टली। सुप्रीम कोर्ट ने 26 फरवरी 2019 की नई तारीख निर्धारित की।

8 मार्च 2019: सुप्रीम कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। अदालत ने पैनल को 8 सप्ताह के अंदर कार्यवाही खत्म करने को कहा। इस पैनल में जस्टिस एफएम खलीफुल्ला, श्री श्री रविशंकर और श्रीराम पंचू शामिल थे।

अगस्त 2019: 1 अगस्त को मध्यस्थता पैनल ने रिपोर्ट प्रस्तुत की। 2 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मध्यस्थता पैनल मामले का समाधान निकालने में विफल रहा और इसे मध्यस्थता के जरिए नहीं सुलझाया जा सकता। 6 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।

16 अक्टूबर 2019: सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या केस की सुनवाई पुरी की और फैसला सुरक्षित रखा।

9 नवंबर 2019: अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का दिन।

   
 
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